My hindi poem “गोरैया नखराली” published in Swargvibha’.. ~an online plateform for expressing our thoughts….
Here is the link…
★★★【”कविता” पढ़ने के लिए नीचे दी गयी लिंक पर जाएं】…..
http://www.swargvibha.in/kavita/all_kavita/nakhrewali.html
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■■[यहाँ पर नीचे दिए गए लेख मे उन विचारों को साझा किया गया है जिनमे वर्तमान मे विलुप्त होती गोरैया के लिए चिंता व्यक्त की गयी है। एवं बचपन को याद करते हुए उसके महत्व को समझने का प्रयास किया गया है ]■■
◆ मुझे याद है जब मैं बचपन मे दाना और पानी टोकरी के नीचे रखकर इंतजार किया करता था की कोई चिड़िया आएगी और मैं रस्सी खींचकर उस सहारे को गिरा दूँगा जिसपर टोकरी रखी है, और फिर वो चिड़िया फस जाएगी मेरे जाल मे।
◆ अकेला कभी इस काम मे कामयाब नही हो पाता था हमेशा बड़े भाई मेरा साथ देते। फिर उस छोटी सी चिड़िया को पकड़कर उसके पंखो को रंग दिया करते और उड़ा देते थे; बड़े गर्व के साथ अपने दोस्तों को बताया करते की देखो वो चिड़िया मेरी है जिसके पंख पर रंग लगा है।
◆ उस वक़्त खुला आँगन था,कच्ची दीवारें थीं, और घर मे ही पपीता,अमरूद,मोगरा,रात-रानी , चांदनी,मुनगा और भी कई तरह के फल- फूल वाले पेड़-पौधे लगाये हुए थे जो हमारे लिए हरयाली और प्राकृतिक वातावरण थे तो नन्ही गोरैया के लिए बसेरा। हालाँकि केवल वो ही एक जगह न थी उसका नीड़ बनाने के लिए, सारा घर उसका ही था।
◆ बड़ा अच्छा लगता था गोरैया को पानी के बर्तनों मे अठखेलियां करते देखना। कोई सुबह ऐसी नही होती थी जो उनके गीतों से शुरू न होती हो। पर छुट्टी वाले दिन उनकी आवाज़ शोर से जादा कुछ भी नही लगती थी जो नींद मे खलल डाले। पर अब बहुत खाली सी सुबह लगती है उस आवाज़ के बिना। हमने ईंट-कंक्रीट के मकान तो खड़े कर लिए, आंगनों मे भी पक्की दीवारें तान दी हों पर समझ ये नही आता की वो कलरव कहाँ गया,और कहाँ गयी वो सजीवता जो हर आँगन मे हुआ करती थी।
◆ बचपन की बातो मे हमेशा गोरैया का ज़िक्र बना रहता है क्योंकि बचपन के खेलो मे अहम साझेदार की भूमिका रहती थी उन नादान पंछियो की। आज समीकरण कुछ बदल से गए हैं। पहले जैसा कुछ नहीं रहा। अपनी ज़िन्दगी मे हम इतना सिमट के रह गए, की अपने आस-पास की उन ज़िंदगियों को भुला बैठे जिनसे सुबह शाम रौनक बनी रहती थी।
◆ हर घर मे रहने वाली, हर आँगन मे दिखने वाली नन्ही सी गोरैया ना जाने रूठकर कहाँ जा पहुँची है। इस बात का अफ़सोस है पर अहसास आत्मा को विचलित कर देने वाला है। मात्र अफ़सोस ज़ाहिर करना नाकाफ़ी है। मानवीय संवेदना का ऐसे ही तो ह्रास नहीं हो सकता की हम अपनी ज़िन्दगी से जुड़े इतने अहम किरदार को अनायास ही भूल जाएं।
◆ परिवार का हिस्सा है गोरैया। और यूँही उसको अनदेखा करना सर्वथा पाप है, हमें बस प्रयास करना है की हम गोरैया को फिर से घर वापस ला सके और उसे वो जगह दे सकें जिसकी वो हक़दार है।
◆ इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर मैं अपनी कविता “गोरैया नखराली” शीर्षक से लिख पाया।उम्मीद करता हूँ की आपको ये कविता और मेरे विचार पसन्द आएंगे और इन्हें आपके प्रेम का सोभाग्य प्राप्त होगा।।
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